सीवान जिले के ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों की निर्णयक्षमता का तुलनात्मक अध्ययन
सपना कुमारी1, अरुणा कुमारी2
1षोध अध्येता, गृह विज्ञान विभाग, जय प्रकाष विष्वविद्यालय, छपरा.
2सहायक प्राध्यापक, गृह विज्ञान विभाग लोक महाविद्यालय हाफिजपुर, छपरा.
*Corresponding Author E-mail:
शोध-सारांषर
किसी परिवार में पोषण, स्वास्थ्य, परिवार नियोजन एवं आर्थिक पहलुओं में निर्णय-क्षमता महिलाओं की कार्यषैली पर निर्भर करता है। वस्तुतः षहरी एवं ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं की कार्यषैली भिन्न होती है जो इस अध्ययन का मुख्य उद्देष्य है। प्राथमिक एवं द्वितीयक डाटा संग्रह 18-49 वर्ष की विवाहित महिलाओं पर प्रष्नावली द्वारा किया गया तथा इन आँकड़ों का सांख्यिकीय विष्लेषण किया गया। विष्लेषण हेतु काई स्क्वायर परीक्षण तथा तार्किक अवरोहण का उपयोग इस अध्ययन में हुआ। इस षोध में ग्रामीण एवं षहरी महिलाओं का औसत उम्र 26.74$6.45 तथा 30.4$7.35 वर्ष औसत रहा जिनमें 67ः ग्रामीण एवं 43ः षहरी महिलाएँ गृहिणी थी। गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाली 33ःग्रामीण एव 21ः षहरी क्षेत्रों की महिलायें देखी गयी। गृह सम्बंधी निर्णयों में शहरी एव ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी 87ःएवं 64ः आकलित किया गया। परिवार नियोजन में निर्णय की क्षमता एवं पारिवारिक आय में षहरी महिलाओं का योगदान ग्रामीण महिलाओं की अपेक्षा अधिक देखा गया।
'kCndqath : ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों की निर्णयक्षमता का तुलनात्मक.
परिचयरू
जीवन के सभी विधाओं में अपनी पूर्ण पहचान एवं विभव के शोध हेतु महिला सषक्तीकरण एक सक्रिय तथा बहुआयामी विधि है जिसपर इनके कार्यषैली का सर्वाधिक प्रभाव होता है (सुधा एवं अन्य, 2011)। अतः महिलाओं की कार्यषैली द्वारा इनके व्यक्तिगत तथा सामाजिक तथ्यों के क्रियाषीलता पर प्रभाव पड़ता है।
किसी भी परिवार तथा राष्ट्र के स्वस्थ विकासषील तथा निर्माणकारी भविष्य हेतु महिलाओं की कार्यषैली को प्रभावी बनाना आवष्यक है। अतः 21 वीं षताब्दी में विकासषील लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु महिलाओं का सषक्तीकरण एवं लिंग समानता को प्रोत्साहित करना होगा (षताब्दी विकास लक्ष्य, 2018)। वस्तुतः समाज में व्याप्त लैगिंक असमानता तथा महिलाओं के षारीरिक तथा मानसिक अपूर्ण विकास के कारण परिवार के विकास में इनकी भूमिका प्रभावित होती है। प्रायः महिलाओं के स्वास्थय जरुरतों की अनदेखी तथा परिवारिक हिंसा के कारण कम षिक्षा, रोजगार तथा आय में कमी इनकी निर्बलता तथा पारिवारिक स्तर पर भी उचित निर्णय में भागीदारी निष्चित नही कर पाता है (यूएनडीपी 2018)। यूएनडीपी से विकसित जेंडर इम्पावरमेंन्ट माॅडेल में निर्णय-क्षमता, षिक्षा तथा स्वास्थ्य अभिरुचि जैसे तीन निर्धारको द्वारा सामाजिक तथा राजनीतिक अधिकारों में महिलाओं की भागीदारी सुनिष्चित होती है(यूएनडीपी 2018)। अपने देष में महिला सषक्तिकरण तथा निर्णायक भागीदारी का राज्यों के साथ ही ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रों में विभिन्नता देखी जाती है (किषोर तथा गुप्ता, 2004)।
इस शोधपत्र में सीवान जिले के महिलाओं हेतु षिक्षा, स्वास्थ्य तथा आय जैसे निर्णायक तथा सषक्तीकरण क्षेत्रों पर ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में भिन्नता के कारण प्रभाव का अध्ययन तथा मूल्यांकन किया गया है।
शोधविधिः-
सीवान जिले के ग्रामीण एवं षहरी महिलाओं के निर्णायक क्षमता का अध्ययन 2019 में प्रजननीय महिलाओं (18-45 उम्र समूह) पर आधारित है। शोध अध्ययन में दोनों क्षेत्रों से इच्छुक 200 विवाहित महिलाओं को ही रखा गया। वैसे छथ्भ्ै द्वारा बिहार में अल्फा-7 के साथ महिलाओं का गृहकार्यों में निर्णय क्षमता 64ःतथा 10ःजबाबदेही हिनता दर एवं पूर्ण दक्षता 6 मापा गया है (एनएफएचएस, 2016)
परिवार बही के प्रतिदर्ष ढ़ाँचा के अनुसार प्रष्नावली के आधार पर कामकाजी महिलाओं की स्वीकृति के बाद यादृच्छिक प्रतिदर्ष मापन किया गया। आँकड़ो का विष्लेषण मिनिटैब 18 साॅफ्टवेयर की सहायता से काई स्क्वायर परीक्षण तथा तार्किक अवरोहण के रुप में किया गया। प्रेक्षण तथा परिणाम:-ग्रामीण तथा शहरी समूहों में भागीदारी महिलाओं का औसत उम्र 26.74$6.45 वर्ष तथा 38.4$7.35 वर्ष देखा गया। सारणी1 में प्रतिभागियों का सामाजिक जनसांख्यिकीय लक्षणें को दिखाया गया है। दोनो समूहो में उच्च विद्यालय स्तर तक षिक्षित महिलाओं के साथ ग्रामीण क्षेत्र में 27ः एवं शहरी क्षेत्र में 14ः निरक्षर पाई गयी। दोनो समूहों में विद्यालय छोड़ने का मुख्य कारण अभिभवकों की ईच्छा के साथ परिवार की गरीबी था। ग्रामीण क्षेत्र में करीब 67ः तथा शहरी क्षेत्र में 43ः महिलाएॅ काम करने की इच्छुक थी, लेकिन पारिवारिक दायित्वों के भार स्वरुप नही कर पा रही थी। गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाली महिलाओं की ग्रामीण तथा षहरी जनसंख्या 33ःतथा 21ः देखा गया। ग्रामीण तथा षहरी क्षेत्रों में अपने शादी से संबंधित निर्णयों में षामिल नही होने वाली महिलाओं की संख्या 38ःएवं 25ः प्रेक्षित हुआ।
सारणी 2 में पारिवारिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रो में सहभागी महिलाओं की निर्णय क्षमता प्रदर्षित की गयी है। ग्रामीण क्षेत्र के 62ःतथा शहरी क्षेत्रों के 79ः तथा महिलाओं के गृहकार्य निर्णयों में भागीदारी देखी गयी तथा यह भिन्नता सांख्यिकीय माहत्विक (च्ढ0ण्05) प्रेक्षित किया गया। परिवार के वित्तीय निर्णयों में 44ःषहरी महिलाओं की अपेक्षा लगभग 29ःग्रामीण महिलाओं की सहभागिता भी सांख्यिकीय मात्र का पाया गया। परिवार नियोजन के सन्दर्भ में षहरी महिलाओं के 74ः की अपेक्षा लगभग 42ः ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी भी सांख्यिकीय महत्व दर्शाता है।
गृहकार्य निर्णयों में महिलाओं का उम्र प्रभावकारी पाया गया। प्रायः व्यस्क महिलाओं की भागीदारी अव्यस्क महिलाओं की अपेक्षा परिवार के बारे में उच्च स्तर तथा सांख्यिकीय महत्व (च्ढ0ण्0001) के साथ प्रेक्षण में पाया गया। महिलाओं की निर्णायक क्षमता पर कुछ तथ्यों जैसे षैक्षिक स्थिति, रोजगार तथा जागरुकता का प्रभाव सांख्यिकीय महत्व का प्रदर्षित हुआ जों ग्रामीण तथा षहरी महिलाओं के निर्णायक क्षमता में विभिन्नता को निर्धारित करने वाला प्रेक्षित हुआ (सारणी 3)। निर्णय लेने की क्षमता में उच्च षैक्षिक स्थिति के कारण गृहकार्यो में शहरी महिलाओं की भागीदारी ग्रामीण महिलाओं की अपेक्षा अधिक देखी गयी। इसी प्रकार शहरी क्षेत्रों की कामकाजी महिलाओं में ग्रामीण अर्द्ध-बेरोजगार महिलाओं की अपेक्षा सांख्यिकीय महत्व का निर्णायक क्षमता शोध में प्रदर्षित हुआ। हाँलाकि दोनों समूहों में स्वयं सहायता समूह से जुड़ी कमानेवाली महिलाओं में सशक्तीकरण तथा पारिवारिक आयवृद्धि में हिस्सेदारी के कारण वित्तीय क्षेत्रों से जुड़ी निर्णयों में भूमिका बढ़ रही है। घरेलू हिंसा का अनुपात शहरो के 36ःकी अपेक्षा ग्रामीण क्षेत्रों में 24ःके साथ ही निरक्षरता तथा बेरोजगारी से प्रभावित हुई है।
विवेचनाः
महिलाओं के सषक्तीकरण के साथ विभिन्न क्षेत्रों में निर्णय लेने की क्षमता इनके पूर्व में पुरुष प्रभुत्व समाज की अपेक्षा सामाजिक उत्थान के अलावा, आर्थिक तथा राजनीतिक स्तर दर्षाता है। पष्चिमी देषो में महिलाएँ जीवन के प्रत्येक पहलुओं में पुरुष के बराबर समान अधिकार तथा स्त्तर निभाती है जबकि भारत के विभिन्न राज्यों में महिलाओं की स्थिति भिन्न है। (किषोर तथा गुप्ता, 2004)
सारणी 1ः-सीवान जिले के सहभागियों का सामाजिक जनसांख्यिकीय विषेषताएँ
बिहार के सन्दर्भ में छथ्भ्ै.3 में सूचित 78ःकी अपेक्षा एनएफएचएस 4 में सभी स्तरों पर महिला सषक्तीकरण 84ःतक पहुँच गया है। इस अध्ययन से ज्ञात होता हैं कि बिहार में षहरी महिलाओं का ग्रामीण महिलाओं की अपेक्षा अधिक सषक्तिीकरण लगातार कायम है। (सुधा तथा अन्य, 2011)। इस अध्ययन में गृहकार्य, वित्तीय, वैवाहिक, प्रजननीय स्वास्थय, परिवार नियोजन तथा स्वास्थ्य सम्बंधी व्यवहार के सन्दर्भ में निर्णय लेने की क्षमता में महिलाओं की कुल कार्यकुषलता बिहार के शहरी क्षेत्र में ग्रामीण इलाको से अधिक होता है। भारत में पूर्व अध्ययन दर्षाता हैं कि भारत के अनेक राज्यों में अभी भी 18 वर्ष से कम उम्र में लड़कियो की षादी हो जाती है (सेही तथा अन्य, 1988)। विभिन्न अध्ययनों से यह ज्ञान होता हैं कि महिलाओं को सीमित ज्ञानार्जन संसाधनों पर नियंत्रित अधिकार तथा निर्णय लेने की न्यूनतम स्वीकृति होती है जो इनके परिवारों में असमान स्थिती निर्धारित करता है (जेजीभाई, 2002)। परिवार नियोजन तथा प्रजननीय स्वास्थय सन्दर्भे में पूर्व अध्ययनों के समतुल्य इस अध्ययन में भी शहरी महिलाओं में ग्रामीण महिलाओं की अपेक्षा निर्णायक भूमिका देखी गयी (जेजीभाई, 2002;विभीता तथा अन्य, 2007)। इस अध्ययन में भी सुधा तथा अन्य (2011) की तरह शहरी महिलाओं में उच्च स्तर की षिक्षा तथा बेहतर रोजगार के कारण गृहकार्य तथा वित्तीय निर्णायक क्षमता अधिक प्रदर्षित हुई है। षिक्षित तथा नौकरी पेषा महिलाओं में सरकार द्वारा चलाए गए महिला सशक्तिीकरण के विभिन्न योजनाओं में वर्धित जागरुकता देखी जाती है। निर्णय लेने की क्षमता पर महिलाओं के अन्य तथ्यों जैसे प्रौढ़ावस्था संयुक्त परिवार की सदस्या तथा निवास के क्षेत्र जैसे शहरी तथा ग्रामीण परिवेष का प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है। इस अध्ययन में सुधा तथा अन्य (2011) के पूर्व अध्ययन की भाँति पारिवारिक हिंसा ग्रामीण क्षेत्रों से अधिक शहरी परिवेष में उभर कर सामने आया है। पारिवारिक हिंसा औरतों के आधारभूत मानवाधिकारों का उल्लंधन है। बिहार के सन्दर्भ में एनएफएचएस-3 की अपेक्षा एनएफएचएस-4 के प्रतिवेदनों में धरेलू हिंसा की कमी देखी गयी है। यहाँ धरेलु हिंसा 41.9ःसे घटकर 34.2ःआँकी गयी है। यहाँ महिलाओं की षिक्षा, रोजगार तथा परिवार के आय में भागीदारी द्वारा पुरुषों के प्रताड़ना में कमी प्रदर्षित हुई है (कामत तथा अन्य, 2010)। अतः अच्छी षिक्षा, रोजगार के बढ़े अवसरों तथा समाज के पूर्ण जागरुकता द्वारा समाज में महिलाओं की निर्णायक क्षमता में वृद्धि देखी गयी है (षेत्तर, 2015)।
उपकल्पना (Hypothesis)
बिहार के सीवान जिले में शहरी तथा ग्रामीण महिलाओं में भिन्नता देखी जाती है। यह भिन्नता सामाज के विभिन्न वर्गो की कार्यषैली, गृह व्यवस्था तथा समय व्यवस्थापन के रुप में परिलक्षित होती है।
उपरोक्त उपकल्पना के परिपेक्ष्य में ही प्रस्तुत शोध परियोजना में विषय से सम्बंधित तथ्यों का विष्लेषण किया गया है। उपकल्पना एक प्रत्याषित सामान्यीकरण होता है जिसके प्रमाणिकता को शोध निष्र्कष में सत्यापित किया जाता है। प्रस्तुत शोध में उपकल्पना को सत्य प्रमाणित करने का प्रयास किया गया है।
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Received on 08.02.2021 Modified on 26.02.2021
Accepted on 13.03.2021 © A&V Publication all right reserved
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